वक्त जवाबदेही का

डाॅ. शशि तिवारी
राजनीति और क्रिकेट में बहुत कुछ समानता है पहला तो दोनों खेल है। दूसरा जब तक बल्ला चल रहा है तब तक केप्टेन चल रहा बल्ला रूकते ही चारों और से आलोचनाओं का दौर शुरू हो जाता है। आलोचकों में से कुछ तो ऐसे भी होते है जिन्हें क्रिकेट के बारे अ ब स द भी नहीं आता ऐसे ही बढ़ चढ़ कर चिल्ला-चिल्ला, गला फाड़कर बोलते ही रहते है। राजनीति में भी कुछ ऐसा ही नजारा विगत् पांच उपचुनाओं झाबुआ, चित्रकूट, अटेर, मुंगावली, कोलारस में भाजपा को लगातार मिलने वाली हार का ही सामना करना पड़ा। केन्द्र में भाजपा के जीत की गारंटी मोदी-शाह तो मध्यप्रदेश में वही मुकाम शिवराज सिंह को हासिल है। लगातार तीन बार प्रदेश मंे काबिज भाजपा मंे मुखिया शिवराज की अपनी ही एक अलग छवि है। निःसंदेह जी तोड़ मेहनत करने वाले है लेकिन यह भी निर्विवाद सत्य है जब एक सरकार लम्बे समय तक शासन करती है तब उसके मंत्रियों/विधायकों मेें एक अभिमान का आ जाना एक स्वभाविक प्रक्रिया है जो समय-समय पर विभिन्न रैलियों एवं बैठकों में हंगामा के रूप में भी सामने आ चुका है। कुछ तो इतने अभिमानी हो गए कि अपने आगे जनता को भी तुच्छ समझने लगे। अच्छाई का परिणाम धीरे-धीरे काफी समय के बाद मिलता है। भाजपा पार्टी इसका उत्कृष्ट उदाहरण केन्द्र 2 में 270 पार। लेकिन यह भी सत्य है बुराईयों से पतन का परिणाम बड़ी शीघ्रता से मिलता है। म.प्र. में झाबुआ से हार का सिलसिला चला तो अब तक जारी है। मद में मदमस्त भाजपा पार्टी ने झाबुआ की हार को बड़े ही हल्के में लिया और इस बाबत् अनेकों तर्क अपने पक्ष में भी खड़े कर लिये। फिर तो हार से सबक न लेने को एक आदत में ही शुमार कर लिया है! यह पार्टी का भी बेहूदा तर्क है कि 2003 में स्थिति क्या थी? यहां यक्ष प्रश्न उठता है कि जब जनता ने भाजपा को लगातार 15 वर्ष शासन के लिए दिये तो फिर कांग्रेस के काल की बात क्यों? अपनी नाकामी और जवाबदेही से बचने का जतन क्यों? निःसंदेह कांग्रेस ने जो किया वो भोग रही है और वे लोग इसे बोलते एवं मानते भी है। दूसरा यक्ष प्रश्न चुनाव के पहले ही उस क्षेत्र के विकास की घोषणा क्यों? पहले क्यों नहीं? विकास किया? तीसरा यक्ष प्रश्न विगत् दो वर्षों से किसानों का आंदोलन न केवल बढ़ा बल्कि कुंछ प्रदर्शन में तो कुछ ने आत्महत्याऐं भी की जो प्रदेश के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है। चैथा यक्ष प्रश्न जब जब प्रदेश के किसान ने बम्पर फसलों की पैदावार की तब-तब सड़कों पर आया और उसे फेंका जैसे ब्याज को 2-3 रूपये में भी कोई खरीदार नहीं मिला सड़कों पर न केवल फेंकी बल्कि सैंकड़ों टन प्याज सड़ भी गई आखिर ये प्रशासनिक कुप्रबंधन का जिम्मेदार कौन? फिर कुछ समय में ही 50-60 रूपये वही प्याज बिकी। क्या यह व्यापारियों को फायदा पहुंचाने की कोई साजिश तो नहीं थी?
हाल ही का मुगावली-कोलारस उपचुनाव भाजपा कांग्रेस से ज्यादा सिन्धिया बनाम शिवराज के रूप में बढ़ चढ़ कर प्रचारित एवं प्रसारित किया गया। तभी तो राजनीतिक के इस दंगल में जाति/योजना/घोषणाओं/लालच/अन्य भेद जो भी हो सकते थे सभी फ्री स्टाइल में चलाये गये। यूं तो चुनाव भाजपा कांग्रेस का था लेकिन भाजपा के ही कुछ भीतरी लोगों ने इसे शिवराज की प्रतिष्ठा का ज्यादा दांव चला। ताकि भविष्य 2018 मुख्य चुनाव में नफा नुकसान के साथ गुप्त खेल भी खेला गया। तीन माह से पूरी सरकार एवं मंत्रियों ने पूर्ण कालिक डेरा डाल दिया जिसमें केन्द्रीय मंत्री भी रहे। शिवराज की 40 रैली 10 रोड़ शो एवं ं सिन्धिया की 35 रैली एवं 15 रोड़ शो का नतीजा सभी के समक्ष है जहां कांग्रेसी ‘‘अबकी बार सिन्धिया सरकार’’ की बात कह रहे है कि वहीं भाजपा सवालों के घेरे में आ गई। अकेले शिवराज की दम पर 2018 का होने वाला मुख्य चुनाव ने भाजपा के माथे पर चिन्ता की लकीर को खींच दिया है! दिल बहलाने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है कि हम जीते नहीं तो क्या हजारों की हार का अन्तर तो कम किया। कांग्रेस की ही तरह अब भाजपा में भी कुछ वरिष्ठ अपने को उपेक्षित महसूस भाजपा के एक वरिष्ठ नेता द्वारा यह कहना जिसे अभिमन्यु समझे वह अर्जुन निकला इसका क्या आशय निकाला जायें? क्या मुंगावली कोलारस का चुनाव धर्मयुद्व था? फिर कृष्ण कौन?
सरकारे तो आती है और जाती है जनता ने लोकतंत्र में वोट के माध्यम से अपना कर्म और कत्र्तव्य पूरा कर जन प्रतिनिधि को विकास कार्य के लिए विधानसभा में बैठाया। अब जनप्रतिनिधियों की जनता के प्रति पूर्ण जवाबदेही है की जनप्रतिनिधि से पूछे विकास क्यों नहीं हुआ? यदि वह जनता की उम्मीद पर खरा नहीं उतरता तो यहां जनता की भी उतनी ही जवाबदेही है कि उस नाकाम जनप्रतिनिधि को बदले! सुषमा स्वराज की एक बात मुझे याद आ रही है। कहती हैं तवे पर रोटी एक ही तरफ रहेगी तो जल जायेगी इसलिए पलटते रहे ताकि स्वाद बना रहें।

लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हैं
मो. 9425677352
शशि फीचर.ओ.आर.जी.

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